Diary of human being
Wednesday, April 30, 2025
अक्षय तृतीया ( छत्तीसगढ़ का अक्ति पानी ) त्यौहार -
Sunday, February 23, 2025
crazy dilemmma
Thursday, January 28, 2021
तीसरा पहलू The Third Aspect:
अक्सर सुनते हैं कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। ज्यादातर हम भी किसी बात के सही झूठ और फिफ्टी-फिफ्टी पर विचार करते हैं । होने को तो हर बात के बहुत से पहलू होते हैं किंतु आजकल ज्यादातर whatsapp facebook या किसी सामान्य बातचीत और दोस्ताना बहसों में भी देखता हूँ कि बातें और बहस राजनीतिक हो जाता है और माहौल जहरीला।
सोशल मीडिया फ्री है, पर इस पर भी सोंचियगा कि
If You're Not Paying For It, You Become The Product. Scott Goodson
पता नहीं कैसे ? क्या समय के साथ लोगों में राजनैतिक जागरूकता आ रही है या सोशल मीडिया के सहज सुलभ होने से लोग अब ज्यादा अभिव्यक्त कर पा रहे हैं , या फिर सोशल मीडिया लोगों के विचारों को नियंत्रित कर रहा है???
आजकल लगता है कि इंसान सोशल मीडिया का उपयोग नहीं कर रहा बल्कि राजनीतिक संस्थाएं उसका उपयोग कर रही है, नैरेटिव सेट कर रही हैं, इतना कुछ परोस रही हैं कि घण्टों बिता दे रहा इंसान पर तृप्ति नहीं, इस तरह से लगता है कि सबके जीवन में राजनीति गहराई से घुस गई है।
शायद technology और internet की सहायता से पॉलिटिशियन्स ने ने सबके व्यक्तिगत जीवन में सेंध लगा दी है। मुझे तो दुनिया दो भागीं में बंटती सी लगती है।
जब ये लेख पढ़ा तो पसंद आया था , सोंचा की ऐसी बहस में पड़ने वालों के काम का है, शायद खलील जिब्रान या ओशो के लिखा हुआ,पता नहीं किसका लिखा है पर कहानी और उसकी शिक्षा महत्वपूर्ण है। कहानी कुछ यूं है:
तीसरा पहलू: हर बात के तीन पहलू होते , आपका, उसका और ...
मैने एक कहानी पढ़ी थी:
एक जादूगर के पास बहुत सी भेड़ें थीं और उसने पाल रखा था भेड़ों को भोजन के लिए।
रोज एक भेड़ काटी जाती थी, बाकी भेड़ें देखती थीं, उनकी छाती थर्रा जाती थी। उनको खयाल आता था कि आज नहीं कल हम भी काटे जाएंगे। उनमें जो कुछ होशियार थीं, वे भागने की कोशिश भी करती थीं। जंगल में दूर निकल जाती। जादूगर को उनको खोज—खोज कर लाना पड़ता। यह रोज की झंझट हो गई थी। और न वे केवल खुद भाग जातीं, और भेड़ों को भी समझातीं कि भागो, अपनी नौबत भी आने की है। कब हमारी बारी आ जाएगी पता नहीं! यह आदमी नहीं है, यह मौत है! इसका छुरा देखते हो, एक ही झटके में गर्दन अलग कर देता है!
आखिर जादूगर ने एक तरकीब खोजी, उसने सारी भेड़ों को बेहोश कर सम्मोहित कर दिया और उनसे कहा: पहली तो बात यह कि तुम भेड़ हो ही नहीं। जो कटती हैं वह भेड़ है, तुम भेड़ नहीं हो। तुममें से कुछ सिंह हैं, कुछ शेर हैं, कुछ चीते हैं, कुछ भेड़िए हैं। तुममें से कुछ तो मनुष्य भी हैं। यही नहीं, तुममें से कुछ तो जादूगर भी हैं।
सम्मोहित भेड़ों को यह भरोसा आ गया। उस दिन से बड़ा आराम हो गया जादूगर को। वह जिस भेड़ को काटता, बाकी भेड़ें हंसती कि बेचारी भेड़!
क्योंकि कोई भेड़ समझती कि मैं मनुष्य हूं! और कोई भेड़ समझती कि मैं तो खुद ही जादूगर हूं मुझको कौन काटने वाला है! कोई भेड़ समझती मैं सिंह हूं ऐसा झपट्टा मारूंगी काटने वाले पर कि छठी का दूध याद आ जाएगा। मुझे कौन काट सकता है?
मेरा मानना ये है कि हमारा हाल भी उन भेड़ों के जैसा ही हो जायेगा, ग़र हम जीवन में हर सुनी-सुनाई बात पर यक़ीन करने लगेंगे..
तो अंततः याद रखिये की हर बात के तीन पहलू होते हैं, आपका, उनका और सच!
तो सच ढूँढिये , जानिए, समझिये !